आजमगढ़। सरकारी सेवा में मानवीय संवेदनशीलता का अद्भुत उदाहरण पेश करते हुए आजमगढ़ के जिलाधिकारी रविंद्र कुमार ने एक दिव्यांग दंपति की पीड़ा को न सिर्फ गंभीरता से सुना, बल्कि त्वरित कार्रवाई कर राहत भी दिलाई। डीएम की यह तत्परता न केवल दिव्यांग दंपति के लिए राहत है, बल्कि शासन की “जीरो टॉलरेंस” नीति को भी ज़मीनी स्तर पर सार्थक बनाती है।

मामला जहानागंज थाना क्षेत्र के कुंजी गांव निवासी दिव्यांग अशोक कुमार और उसकी पत्नी से जुड़ा है। चिलचिलाती धूप और उमस भरी गर्मी के बीच अशोक अपनी विकलांग पत्नी को पीठ पर लादकर कलेक्ट्रेट कार्यालय पहुंचा। उसके चेहरे पर पसीना ही नहीं, बल्कि वर्षों की बेबसी और संघर्ष की लकीरें साफ झलक रही थीं। अशोक ने जिलाधिकारी को बताया कि उनका मकान गाटा संख्या 364 में स्थित है, लेकिन वहां तक पहुँचने का कोई रास्ता नहीं है। बारिश में कीचड़ और दलदल के कारण जीवन और भी कठिन हो गया है।

जनसुनवाई के दौरान डीएम ने इस मामले को तत्काल संज्ञान में लिया और चकबंदी अधिकारी को निर्देशित किया कि तुरंत पैमाइश कर रास्ता सुनिश्चित किया जाए। पता चला कि अशोक कुमार ने करीब दस वर्ष पहले आबादी क्षेत्र छोड़ खेत में मकान बना लिया था और तभी से वह मेढ़ से होकर घर आता-जाता रहा है। चकबंदी प्रक्रिया के कारण उसका एकमात्र रास्ता भी बंद हो गया था।

चकबंदी अधिकारी सठियांव की टीम ने उसी दिन मौके पर पहुँचकर पैमाइश की और 10 कड़ी का चकमार्ग प्रस्तावित करते हुए उसका सीमांकन करा दिया। जिलाधिकारी ने इस पर संतोष जताते हुए मुख्य विकास अधिकारी को निर्देश दिया कि मनरेगा के तहत जल्द से जल्द रास्ते पर खड़ंजा लगवाया जाए।

यह कार्यवाही एक मिसाल है कि जब प्रशासन संवेदनशीलता और जिम्मेदारी से कार्य करता है, तो कमजोर और वंचित वर्ग की पीड़ा को भी न्याय मिल सकता है।