राजीव चौहान

आज़मगढ़। गोवंश संरक्षण के नाम पर चल रही व्यवस्था की सच्चाई पारनकुंडा गोशाला कांड ने बेनकाब कर दी है। जहां सुरक्षा, निगरानी और जिम्मेदारी होनी थी, वहीं तस्करों ने बेखौफ घुसकर गोवंशों पर जुल्म किया और पूरा सिस्टम मूकदर्शक बना रहा।

जीयनपुर कोतवाली क्षेत्र के अजमतगढ़ स्थित ग्राम पंचायत पारनकुंडा की अस्थायी गोशाला में पशु तस्करों की घुसपैठ और  गोशाला के भीतर पिकअप वाहन के जरिए चार गोवंशों को क्रूरता पूर्वक बांधकर ले जाने का प्रयास किया गया
जांच के दौरान पुलिस को कई चौंकाने वाले तथ्य हाथ लगे हैं।

गोशाला में लगा सीसीटीवी कैमरा बंद था, उसकी सिम और मेमोरी कार्ड गायब मिले, जबकि मुख्य द्वार पर लगा ताला खुला हुआ पाया गया। इससे साफ है कि पिकअप वाहन बिना किसी अवरोध के सीधे गोशाला परिसर में प्रवेश कर गया। पुलिस प्रथम दृष्टया इस पूरी घटना को सुनियोजित साजिश मान रही है। वही पुलिस ने इस मामले में छह संदिग्धों को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी है।


एसपी ग्रामीण चिराग जैन ने बताया कि मौके से बरामद पिकअप वाहन के आधार पर गोतस्करों तक पहुंचने का प्रयास किया जा रहा है। आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए तीन विशेष पुलिस टीमें गठित की गई हैं, जो लगातार दबिश दे रही हैं।


ग्राम स्तरीय गोवंश संरक्षण समिति के तहत गोशाला की जिम्मेदारी ग्राम प्रधान राजमति देवी, ग्राम पंचायत अधिकारी सुरेंद्र प्रसाद तथा रात्रिकालीन केयर टेकर पप्पू शाही उर्फ तेज प्रताप शाही पर है। घटना के बाद से केयर टेकर का मोबाइल फोन बंद बताया जा रहा है और वह गांव में भी नजर नहीं आ रहा है, जिससे उसकी भूमिका को लेकर संदेह और गहरा गया है।
घटना के उजागर होने के बाद प्रशासन ने आनन-फानन में गोशाला में दो सफाई कर्मचारियों की अस्थायी ड्यूटी लगा दी है। साथ ही यह निर्णय लिया गया है कि सप्ताह भर के भीतर गोशाला में मौजूद सभी मवेशियों को दूसरी सुरक्षित जगह भेज दिया जाएगा


सरकारी गोशाला में ताला खुला मिले, CCTV की सिम और मेमोरी कार्ड गायब हों और गोतस्कर पिकअप लेकर अंदर तक घुस जाएं—तो यह महज़ चूक नहीं, सिस्टम की खुली नाकामी है। जिस केयर टेकर पर रात की सुरक्षा थी, उसका घटना के बाद मोबाइल बंद कर गायब हो जाना संदेह को और गहरा करता है।

जिम्मेदार अधिकारी और संरक्षण समितियां अगर सच में सक्रिय होतीं, तो गोवंशों को इस तरह बांधकर क्रूरता नहीं झेलनी पड़ती। सवाल यह भी है कि बिना अंदरूनी मिलीभगत के इतनी सुनियोजित वारदात कैसे संभव हुई। यह घटना सिर्फ गोतस्करी नहीं, बल्कि पूरे निगरानी और जवाबदेही तंत्र पर करारा तमाचा है।


सवाल जिले की पुलिस पर भी खड़े हो रहे हैं कि क्षेत्र में गोतस्करों की जानकारी उसे समय रहते क्यों नहीं हो सकी, जबकि पड़ोसी जनपद मऊ की पुलिस ने न सिर्फ तस्करों की लोकेशन ट्रेस की बल्कि छापेमारी कर पूरे प्रकरण का खुलासा भी कर दिया। इधर जनपद पुलिस तीन दिनों से क्षेत्र के चिन्हित तस्करों के ठिकानों पर दबिश तो दे रही है, लेकिन अपेक्षित सफलता अब तक नहीं मिल सकी है।

वहीं प्रशासनिक चूक भी खुलकर सामने आ रही है। समय-समय पर गोशाला के निरीक्षण की जिम्मेदारी जिन ब्लॉक स्तरीय अधिकारियों पर थी, वे फील्ड में जाने के बजाय ठंड में हीटर तापते रहे और सारी व्यवस्था ग्राम प्रधान व सफाई कर्मचारियों के भरोसे छोड़ दी, जबकि गोशाला में अव्यवस्थाओं का अंबार लगा रहा। घटना के बाद जब जिला स्तरीय अधिकारी मौके पर पहुंचे और सवाल दागने शुरू किए, तो जिम्मेदार एक-दूसरे पर ही ठीकरा फोड़ते नजर आए।