आजमगढ़। महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय के प्रशासनिक भवन सभागार में ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ कुलपति प्रो. संजीव कुमार की अध्यक्षता में मनाया गया।
मीडिया प्रभारी डॉ. प्रवेश कुमार सिंह ने बताया कि कुलपति ने 14 अगस्त 1947 को भारत-पाकिस्तान विभाजन को भारतीयों के लिए सबसे पीड़ादायक दिन बताया। उन्होंने कहा कि ब्रिटिश हुकूमत की साजिश से भारत मां के दो टुकड़े हुए और देश को छिन्न-भिन्न करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई। उस समय स्वतंत्रता की खुशी के साथ विभाजन का दर्द भी झेलना पड़ा।

कुलपति ने विभाजन की भयावहता का चित्रण करते हुए कहा कि लोग घर-बार छोड़कर भाग रहे थे, रेलवे स्टेशनों पर लाशों का अंबार लगा था, और इंसानियत समाप्त हो गई थी। गांव, पानी और संपत्ति का बंटवारा मां की छाती को छलनी कर रहा था। उन्होंने कहा कि वतन का बंटवारा दो ही परिस्थितियों में होता है—जबरन या आजीविका हेतु, और 1947 का विभाजन जबरन था। शरणार्थियों ने कभी भीख नहीं मांगी बल्कि मेहनत कर राष्ट्र निर्माण में योगदान दिया। उन्होंने जाके पाँव न फटी बेवाई, वो का जाने पीर पराई कहावत से उपस्थित जनों को उस पीड़ा से जुड़े रहने का संदेश दिया और कहा कि बंटवारा दिलों का भी हुआ।

कार्यक्रम में कुलसचिव अंजनी कुमार मिश्र और उप कुलसचिव केश लाल ने आयोजन समिति को बधाई देते हुए कहा कि ऐसे आयोजन ऐतिहासिक घटनाओं की पुनर्स्मृति के लिए आवश्यक हैं। उन्होंने विभाजन को अंग्रेजों की चाल बताया और ऑपरेशन सिंदूर का उल्लेख कर सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने का अनुरोध किया।

संयोजक प्रो. प्रशांत राय ने ‘विभाजन’ शब्द को ही पीड़ादायक बताते हुए ‘अ ट्रेन टू पाकिस्तान’ और ‘हे-राम’ पुस्तकों के अध्ययन की सलाह दी। प्राध्यापिका त्रिशिका और डॉ. देवेंद्र पांडे ने विभाजन को अत्यंत डरावना बताया।

इस अवसर पर सहायक कुलसचिव डॉ. महेश श्रीवास्तव, डॉ. प्रवेश, डॉ. पंकज, डॉ. जयप्रकाश, विश्वविद्यालय के गणमान्य प्राध्यापक, छात्र-छात्राएं, कुलपति के निजी सचिव भूपेंद्र पांडे और विपिन शर्मा सहित अन्य लोग उपस्थित रहे। अंत में कुलपति ने एक भारत, श्रेष्ठ भारत का नारा लगाकर अपने विचार समाप्त किए।