आज़मगढ़। श्री सुंदर गुरुद्वारा मातबरगंज में बुधवार की शाम चार साहिबज़ादों एवं माता गुजरी जी की महान शहादत को समर्पित विशेष धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। अमृतसर स्थित शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की ओर से आए ज्ञानी जगबीर सिंह जी ने कथा के माध्यम से संगत को वीरता, त्याग और धर्मनिष्ठा की अमर गाथा से अवगत कराया।
श्री सुंदर गुरुद्वारा मातबरगंज में सायं 7 बजे आरंभ हुए कार्यक्रम में ज्ञानी जगबीर सिंह जी ने चार साहिबज़ादों—साहिबज़ादा अजीत सिंह, साहिबज़ादा जुझार सिंह, साहिबज़ादा जोरावर सिंह और साहिबज़ादा फतेह सिंह—तथा माता गुजरी जी की शहादत का मार्मिक वर्णन किया। कथा के दौरान उन्होंने बताया कि गुरु गोबिंद सिंह जी और माता जीतो जी के पुत्र चारों साहिबज़ादे बचपन से ही सिख धर्म की शिक्षाओं में रचे-बसे थे और उनके जीवन में साहस, निस्वार्थता, न्याय और मानव समानता के मूल्य गहराई से समाहित थे।
कथा में आनंदपुर साहिब की घेराबंदी और उस दौर की कठिन परिस्थितियों का उल्लेख किया गया, जहां भूख, संकट और अत्याचार के बावजूद सिखों ने अदम्य साहस का परिचय दिया। चमकौर के युद्ध (1704) का वर्णन करते हुए ज्ञानी जी ने बताया कि साहिबज़ादा अजीत सिंह और साहिबज़ादा जुझार सिंह ने अल्पसंख्यक बल के साथ मुगल सेना के विरुद्ध असाधारण वीरता दिखाई और धर्म की रक्षा करते हुए शहादत प्राप्त की।
वहीं, साहिबज़ादा जोरावर सिंह और साहिबज़ादा फतेह सिंह को माता गुजरी जी के साथ सरहिंद में कैद किया गया। अनेक अत्याचारों और धर्म परिवर्तन के प्रस्ताव के बावजूद दोनों बाल साहिबज़ादे अपने सिख धर्म पर अडिग रहे और 26 दिसंबर 1705 को नवाब वज़ीर खान के आदेश पर उन्हें जीवित ईंटों में चुनवा दिया गया। जिस स्थान पर यह घटना हुई, वह आज फतेहगढ़ साहिब गुरुद्वारे के रूप में श्रद्धा का केंद्र है।
कार्यक्रम में सभी धर्मों के लोगों ने सहभागिता कर चार साहिबज़ादों एवं माता गुजरी जी की महान शहादत को नमन किया और श्रद्धांजलि अर्पित की। गुरुद्वारे में श्रद्धा, एकता और बलिदान की भावना से ओतप्रोत वातावरण बना रहा।
