पारंपरिक वेशभूषा में सजे-धजे कलाकारों की रंगयात्रा ने जैसे पूरे शहर को रंग, ताल और भाव से सराबोर कर दिया। यह रंगयात्रा अग्रवाल धर्मशाला से प्रारंभ होकर तकिया, कोट दलालघाट, चौक मातबरगंज होते हुए पुनः अग्रवाल धर्मशाला पर आकर समाप्त हुई। यात्रा का नेतृत्व अभिषेक जायसवाल ‘दीनू’ ने किया।
इस रंगयात्रा में देश के विभिन्न राज्यों से आए कलाकारों ने सहभागिता कर ‘एक भारत–श्रेष्ठ भारत’ की जीवंत झलक प्रस्तुत की।
रॉकिंग डांस ग्रुप कैमूर (बिहार), नृत्य कला केंद्र उड़ीसा, सालेपुर कला केंद्र कटक (उड़ीसा),
पीपीएस डांस ग्रुप उत्तराखंड, साथ ही सुल्तानपुर, फिरोजाबाद, झारखंड और हुनर संस्थान के कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
श्री अग्रसेन महिला महाविद्यालय में चल रहे रंग महोत्सव के सांध्य सत्र का शुभारंभ माँ सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। उद्घाटन अतिथि कलाकारों विशंभर साहू (वापी), बिधा न चंद्र दास एवं किशोर कुमार दलाई ने किया।
सर्वप्रथम एकल नृत्य प्रतियोगिता का आयोजन हुआ, जिसमें बीके दास कल्चरल अकैडमी, कोलकाता के कलाकारों ने लोक, शास्त्रीय और वेस्टर्न सहित 70 से अधिक नृत्य शैलियों की अद्भुत प्रस्तुति दी, जिसने दर्शकों को तालियाँ बजाने पर मजबूर कर दिया।
दूसरे सत्र में पथ, जमशेदपुर द्वारा मोहम्मद निजाम के निर्देशन में नाटक ‘अतृप्त’ का प्रभावशाली मंचन किया गया। सामाजिक संवेदनाओं को छूते इस नाटक ने दर्शकों को सोचने पर विवश कर दिया।
इस अवसर पर संस्थान के पदाधिकारी एवं सदस्यगण अनूप अग्रवाल, सुनील अग्रवाल, रमाकांत वर्मा, प्रमोद कुमार सिंह, गजराज प्रसाद, सुनील कुमार अग्रवाल, रिमझिम प्रजापति, आस्था दुबे, तारा, रितिका, डॉ. पंकज सिंह, संतोष कुमार सिंह, अभिषेक राय ‘तोशी’, कमलेश सोनकर, राज पासवान, दीपक जायसवाल, रवि गोंड सहित बड़ी संख्या में कला प्रेमी उपस्थित रहे।
रंगमंच एवं ललित कलाओं के क्षेत्र में समर्पित ‘हुनर’ सामाजिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था द्वारा पिछले 24 वर्षों से लगातार आयोजित हो रहे हुनर रंग महोत्सव के दूसरे दिन का उद्घाटन माँ सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन कर किया गया।
व्यंग्य की तीखी धार: ‘ताजमहल का टेंडर’
द्वितीय सत्र में पहली नाट्य प्रस्तुति ड्रामाटरजी आर्ट एंड कल्चर सोसायटी, दिल्ली द्वारा मंचित ‘ताजमहल का टेंडर’ रही। अजय शुक्ला द्वारा लिखित यह व्यंग्यात्मक नाटक इस कल्पना पर आधारित है कि अगर मुग़ल बादशाह शाहजहाँ आज के दौर में ताजमहल बनवाने निकलें, तो सरकारी दफ्तरों, टेंडरों और लालफीताशाही के बीच उनका सपना कैसे उलझ कर रह जाएगा।
नाटक में दिखाया गया कि कैसे प्रेम की याद में बनना वाला स्मारक, काग़ज़ी कार्रवाई, भ्रष्टाचार और सरकारी देरी की भेंट चढ़ जाता है। चुटीले संवादों और तीखे हास्य के ज़रिये यह प्रस्तुति दर्शकों को हँसाती भी है और मौजूदा व्यवस्था पर सोचने को भी मजबूर करती है।
संघर्ष से रोमांस तक: ‘जंगली भालू’
दूसरी नाट्य प्रस्तुति विकेंड थिएटर एंड फ़िल्म्स, दिल्ली द्वारा प्रस्तुत ‘जंगली भालू’ रही। नाटक की कहानी गुलगुल रानी, एक युवा विधवा, के इर्द-गिर्द घूमती है, जो पति की याद में खुद को दुनिया से काट चुकी है।
कहानी तब मोड़ लेती है जब भोला सिंह, एक गुस्सैल और दबंग व्यक्ति, उधारी के पैसे मांगने उसके घर पहुँचता है। तंज़, टकराव और शब्दों की जंग के बीच मामला इतना बढ़ जाता है कि पिस्तौल से ड्यूएल का चैलेंज तक आ जाता है। लेकिन यहीं से कहानी नया रंग लेती है — गुस्सा धीरे-धीरे आकर्षण में बदलता है और अंत में प्रेम का अप्रत्याशित इज़हार दर्शकों को चौंका देता है।
कलाकारों का यथार्थ: ‘काल कोठरी’
तीसरी प्रस्तुति कला संगम, गिरिडीह (झारखंड) द्वारा मंचित स्वदेश दीपक लिखित नाटक ‘काल कोठरी’ रही। यह नाटक रंगमंच से जुड़े कलाकारों के जीवन संघर्ष को बेहद संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करता है, जिसमें पारिवारिक दबाव, आर्थिक तंगी और व्यवस्था की उपेक्षा के बीच कलाकार अपनी कला को जीवित रखने की जद्दोजहद करता दिखाई देता है।
नृत्य प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल में अष्टभुजा मिश्र (वाराणसी) एवं अशोक शर्मा (अलवर, राजस्थान) शामिल रहे।
इस अवसर पर हेमंत श्रीवास्तव सहित संस्थान के पदाधिकारी गौरव, मौर्या, सपना बनर्जी, प्रमोद कुमार सिंह, गजराज प्रसाद, कमलेश सोनकर, राज पासवान, रवि गोंड समेत बड़ी संख्या में रंगमंच प्रेमी मौजूद रहे।