शीतला माता धाम से उठी पहल

आजमगढ़/मऊ।
लोक दायित्व के तत्वावधान में रविवार 31 अगस्त की सुबह 7 बजे से शुरू हुई ‘जल तीर्थ यात्रा’ ने न केवल नदियों और तालाबों की वर्तमान स्थिति का जायजा लिया, बल्कि उनकी स्मृतियों और महत्ता को भी सामने लाया। यात्रा का शुभारंभ शीतला माता मंदिर धाम से हुआ और अनेक पड़ावों से गुजरते हुए मगही नदी के तट पर इसका समापन हुआ।

‘नदी की व्यथा’ संगम से उजागर

पहला पड़ाव सरोज मोड़ के पास तमसा और मूल सरयू के संगम पर रहा। यहां निरीक्षण के बाद जब स्थानीय लोगों से बातचीत हुई तो नदी की पीड़ा सामने आई।
एक बुजुर्ग निवासी ने कहा, ‘बेटा, तीस साल पहले यह पानी इतना साफ था कि लोग सीधे पी लेते थे। अब घोसी की चीनी मिल का गंदा पानी इसमें डाला जाता है। नदी मर रही है, हमें बहुत दुख होता है।’

पिहुआ ताल की छिपी कहानियां

इसके बाद यात्रा दल पकड़ी-पिहुआ ताल पहुंचा। ग्रामीणों ने बताया कि तालाब की गहराई में सफेद मोटा बालू मिलता है। एक किसान ने कहा, ‘यह तालाब कभी बड़ी नदी का हिस्सा रहा होगा। पानी की चमक भले कम हुई हो, लेकिन इसका इतिहास बहुत पुराना है।’

‘बड़ी सरयू’ से जुड़ा जन-जीवन

यात्रा दल आगे बढ़ते हुए सुगी चोरी गांव में सरयू की वितरिका तक पहुंचा। लोगों ने बताया कि यह आगे जाकर बड़ी सरयू से मिल जाती है। बरहज के किनारे बड़ी सरयू की झलक पाकर दल ने इसे जन-जीवन से जोड़ने का संकल्प दोहराया।

तालाबों और नालों की हकीकत

इसके बाद दल ने रतोही ताल, हां-हां नाला, रतनपुरा का गाढ़ा तालाब और बहादुरगंज के पास मूल सरयू-भैसही संगम का निरीक्षण किया। हर जगह लोगों ने कहा कि पहले पानी जीवनदायी था, लेकिन अब प्रदूषण और उपेक्षा ने हालात बिगाड़ दिए हैं।

वन देवी धाम से मगही नदी तक

अंतिम पड़ाव में दल वन देवी धाम मंदिर पहुंचा और मगही नदी के तट पर जाकर यात्रा का समापन किया। यहां सभी कार्यकर्ताओं ने जल संरक्षण और नदी-तालाबों के पुनर्जीवन का संकल्प लिया।

‘जल तीर्थ यात्रा’ ने साबित किया कि नदियों और तालाबों की स्मृतियां आज भी लोगों के दिलों में जीवित हैं। लोक दायित्व ने इस यात्रा से समाज को संदेश दिया कि ‘जल ही जीवन है और जलतीर्थों का संरक्षण ही हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।’

यात्रा में डॉ. पवन कुमार सिंह, डॉ. ज्ञानेंद्र मिश्रा, अनिल कुमार वर्मा, प्रभात कुमार राय, अभिनय तिवारी, छोटेलाल गांधी, श्रीकांत त्रिपाठी, सोनू साहनी, पप्पू जी महाराज और रामकथा वाचक अलंकार कौशिक सहित कई कार्यकर्ताओं की सक्रिय भागीदारी रही। इसमें तमसा गंगा सेवा समिति का भी विशेष सहयोग रहा।